Monday, April 23, 2012

समीक्षा - अन्नान्दोलन: सम्भावनाएं और सवाल

              अरुणोदय प्रकाश को करीब से जानने वाले या फिर जानने का दावा करने वालो के लिए किताब किसी सुखद आश्चर्य से कम नहीं है । वजह ये है की जब उन्होंने पहली बार इस किताब पर काम करने का जिक्र किया था , तब ये स्वाभाविक रूप से लगा था की किताब English में होगी क्यूंकि अरुण English मे ही लिखना पसंद करते है – नजीर है उनका ब्लॉग । मगर फिर भी उन्होंने माध्यम हिंदी चुना जो वाकई स्वागतयोग्य है । अरुणोदय साथी पत्रकारों से थोडा अलग है। थोड़े से संकोची और काफी संवेदनशील। किताब में उनके दोनो रूप साफ़ दीखते है। व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है की किताब में थोड़े और पन्ने हो सकते थे और इसके लिए मै अरुण के संकोची स्वाभाव को ही जिम्मेदार मानता हूँ। संवेदनशील इसलिए क्यूंकि मेरा अरुण के साथ पिछले 5 साल लगभग हर दिन करीब 10 घंटे साथ काम करने का अनुभव है और ये मैंने हमेशा देखा है की वो खबर को दिल पर लेते है- सोचते है , समझते है और कभी कभी बोलते भी है। वो उनलोगों में से नहीं है जो पत्रकारिता को क्रांति का झंडा बना कर हमेशा आक्रामकता से प्रहार करते है और न ही उस जमात के है जिनके लिए खबर विजुअल और बाईट है। सिस्टम में रहकर सिस्टम सही करने की सोच रखने वाले अरुण की किताब “अन्नान्दोलन: सम्भावनाएं और सवाल” भी उनके अक्स को दिखाती है। इसमें न तो “अन्नान्दोलन” की अंध भक्ति है और न ही “सम्भावनाएं और सवाल” उठाते समय कोई नकारात्मक धारणा।

         दरअसल अन्ना एक आंधी कि तरह आये और उनके नेतृत्च में पूरा देश भ्रष्टाचार के खिलाफ सड़क पर उतरा। हर तरफ आवाज़ उठी की `जन लोकपाल लाओ- भ्रष्टाचार भगाओ”। कईयों को आंदोलन एक सार्थक प्रयास लगा तो कईयों को फैशन परेड । हम पत्रकारों के लिए ये आंदोलन पहले एक इवेंट की तरह था जिसमें ओबी लगाओ, रिपोर्टर फिट करो और नज़र रखो की रणनीति बनायीं गयी मगर धीरे धीरे ये परेड जोर पकड़ने लगी । जन लोकपाल की लड़ाई ने धीरे धीरे ही सही लेकिन भारतीय `जनतंत्र´ के खोखलेपन को उजागर कर दिया । सवाल उठा की क्या यह सरकार, यह व्यवस्था और यह संसद कभी भी देश को एक ऐसा क़ानून दे सकती है जो भ्रष्टाचार को रोके ? चाहे किसी भी पार्टी की सरकार बने पर क्या आम आदमी बिना घूस दिए काम करा सकता है ? क्या भ्रष्टाचारी नेता और पार्टियां कभी भी अपने गले में खुद फांसी का फंदा डालेंगे ? सवाल व्यवस्था पर भी उठा की क्या वक्त नहीं आ गया है की पूरी व्यवस्था को ही आमूल चूल रूप से बदला न जाए ? आखिर कब तक जन लोकपाल क़ानून आयेगा और अगर वो आया तो उसका स्वरुप क्या होगा ? ये सारे वो सवाल है जो “अन्नान्दोलन: सम्भावनाएं और सवाल” में अरुणोदय प्रकाश ने उठाये गए है

           मै आपातकाल और जेपी के बाद की पैदाइश हूँ और मेरी पीढ़ी के लिए ये पहला आंदोलन था जो जनांदोलन के रूप में बदला। आंदोलन कहना इसलिए भी जायज़ होगा क्यूंकि किसी एक मांग को लेकर जनसमूह सडको पर था। कई मित्र कहते थे की कुछ हज़ार की भीड़ को जनांदोलन कहना जायज़ नहीं होगा मगर याद नहीं आता की कब इस तरह आम जनता के दवाब में नेता इससे पहले आये हो। ये भी नहीं याद आता की इससे पहले कब नेताओ और अभिनेताओ के अलावा किसी और को सुनने के लिए भीड़ इस कदर इकट्ठी होती हो और ये भी नहीं याद आता की कब देसज भाषा में बात करने वाला कोई बुज़ुर्ग और चप्पल पहन के चलने वाला एक व्यक्ति सांसदों को इस तरह भयभीत कर पाया हो ? मगर ये आंदोलन सर्वगुण संपन्न नहीं था और आंदोलन का स्वरुप कई कदमो पर भटका भी। “अन्नान्दोलन: सम्भावनाएं और सवाल” में तमाम लेखो में ये बात साफ़ हो जाती है । जैसा की “अन्नान्दोलन: सम्भावनाएं और सवाल” में वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष लिखते है की अन्ना को लेकर पहले पत्रकारों की सोच क्या थी और वो कैसे कैसे बदली, किस तरह से बेहद मामूली समझे जाने वाला व्यक्ति एकदम से नया गांधी बन गया तो वहीं वरिष्ठ पत्रकार विजय विद्रोही उन सभी पहलुओ को उठाते दीखते जो आंदोलन के लिए मुश्किलें लेकर आया ।  पर पाठकों के लिए इससे अच्छा और क्या होगा की सभी सवालो पर इसी संकलन में अरविन्द केजरीवाल और मनीष सिसोदिया जवाब भी देते है । दरअसल आंदोलन से जुड़े कुछ अच्छे लेखों का संकलन इस किताब में किया गया है जिनमे अरविंद केजरीवाल, अरुणा राय, आशुतोष, विजय विद्रोही, सुधांशु रंजन, आनंद प्रधान, मनीष सिसोदिया, शकील अहमद जैसे नाम शामिल हैं । मात्र 253 पन्नों में अरुणोदय आंदोलन से जुड़े तमाम पक्षों को सामने ले आये। कांग्रेस का नजरिया लेकर आये शकील को पढ़ना वाकई दिलचस्प था तो दूर खाड़ी देश में बैठे भारतीय पत्रकार सैयद अली का लेख भी एक अलग नजरिया लिए हुए था । निखिल डे इस आंदोलन को जहाँ RTI के प्रयासों की अगली कड़ी के तौर पर देखते है तो वहीं उदित राज आंदोलन की सबसे बड़ी कमजोरी इसका सामाजिक सरोकारो से दूर होना मानते है ।

            किताब के तमाम खासियतो के अलावा एक जो बात सबसे आकर्षक है वो है इसकी सरलता। इतने बड़े बड़े नाम लेकिन किसी ने भी भाषा की महिमा और व्यर्थ का पांडित्य दिखने की कोशिश नहीं की। सरल भाषा में मौजूदा परिस्थितया और उनसे उपजे आंदोलन को तथ्यों के सांचे में ढाल कर लिखे गए लेखो का संकलन है “अन्नान्दोलन: सम्भावनाएं और सवाल” और इसलिए मेरा पूरे विश्वास के साथ मानना है की जनलोकपाल और अन्ना आंदोलन के बारे में पुख्ता और उम्दा जानकारी पाने का एक बेहतरीन जरिया ये किताब हो सकती है । पर आखिर में फिर वही शिकायत श्रीमान प्रकाश से की किताब इतनी भी छोटी नहीं होनी चाहिए की मेरे जैसा अस्थिर व्यक्ति भी World Book Fair में किताब खरीदने के बाद उसे एक ही सिटिंग में बैठकर खत्म कर दे।

Friday, March 2, 2012

पान सिंह तोमर - समीक्षा

"'देश के लिए भागे तो किसी ने नहीं पूछा, बागी हो गए तो सबही माला जपत है"' पान सिंह तोमर का ये डायलाग ही पूरी फिल्म को बयान करता है। इसमें कोई शक नहीं की अपने देश में सच्चे हीरोज़ को सम्मान देने की परंपरा नहीं है। एक ऐसा नौजवान जो फौज में इसलिए शामिल हुआ क्यूंकि उसे लगता है की केवल यहीं चोरी चकारी नहीं है..........उसे भूख ज्यादा लगती थी इसलिए ज्यादा खाने के लिए वो स्पोर्ट्स में शामिल होता है,.... दौड़ने में बेहद माहिर वो अपना मेन इवेंट इसलिए छोड़ देता है क्यूंकि उसका कोच उससे अपने स्वार्थ की वजह से ऐसा करने को कहता है........ और जब वो दौड़ता है तो नेशनल चैम्पियन बनता है... भारत के लिए पदक लाता है........सवाल ये है की वो एक दिन बंदूक उठाकर “डाकू” माफ़ कीजियेगा “बागी” क्यूँ बन जाता है। एक सच्ची कहानी पर बनी फिल्म जिसमे बेमिसाल अदाकारी है, कसी हुई पटकथा है और कमाल का निर्देशन है, साथ ही खेल है, जीत है, थोडा बहुत रोमांस है, इमोशनल ड्रामा है और साथ में ग्रे शेड्स नायक की दिल तोड़ देने वाली मौत भी। यानि ये समझने की गलती मत कीजियेगा की फिल्म कोई आर्ट फिल्म है। गंभीर मौको पर भी ऐसे चुटीले संवाद की हंसी आ ही जाएगी।

कहानी आजादी के बाद की है और पान सिंह तोमर की असल जिंदगी पर है। जिन्दगी भी ऐसी जिसमे कई रंग है- गुस्सा है, क्षोभ है, नियम कायदे भी है। कहानी इस तरह गुंथी हुई है की एक कातिल डाकू से आपको हमदर्दी हो जाएगी। चंबल के बीहड़, गांव की कच्ची ज़मीन, उसकी लाल दुश्मनी और साथ ही भारतीय खेलो की दुर्दशा- इन सब पर डायरेक्टर तिग्मांशु धूलिया ने क्या शानदार रिसर्च की और उतने ही बेहतरीन सीन भी क्रिएट किए। मेरे लिए तो फिल्म के असल हीरो वही है- देसी कहानिया देसी अंदाज़ में ही दिखाने में वो बेमिसाल है। अब इसी फिल्म को लीजिये - डाकूवों के दल में एक सज्जन हमेशां हनुमान चालीसा और रामचरित मानस पढ़ते दिखेंगे तो गालियाँ देकर जोश बढाता कोच भी। इरफान खान की एक्टिंग बेहतरीन है और इसमें नया कुछ भी नहीं है, जिन्दगी के तमाम रंग अलग अलग उम्र में कैसे दिखाए जाते है ये कोई इरफ़ान से सीखे। साथ में माहि गिल, राजेंद्र गुप्ता जैसे कलाकार भी है पर इरफ़ान पूरी फिल्म में छाये है। डायलॉग्स में चम्बल के क्षेत्रो ग्वालियर, भिंड, मुरैना की छाप साफ़ देखि जा सकती है। .

यह फिल्म डकैतों पर बनी बाकी की फिल्मो से अलग अलग है, इसमें डकैत न तो डरावना दीखता है, न ही क्रूर तरीके से ठहाके लगता है। ये फिल्म हकीकत के करीब है और हमें उन वजहों से वाकिफ कराती है, जिनकी वजह से एक एथलीट डाकू बनता है । ये आदमी यूँ तो देश की धरोहर है, देश के लिए कई पदक भी जीते है , लेकिन जब उसे मदद की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तब न तो देश और न ही इसका कानून उसके साथ आकर खड़ा होता है । यह फिल्म इंसान की कुंठा को बहुत खूबी से दिखाती है। फिल्म की एकमात्र दिक्कत ये है की कभी-कभी ये थोड़ी धीमी पड़ जाती है। लेकिन फिर भी ये एक मस्ट वाच फिल्म है

सवाल फिर से व्यवस्था का है- और हर बार एक ही सवाल आखिर क्यूँ ? .... आखिर क्यूँ एक शानदार एथलीट डकैत बनता है? आखिर क्यूँसमाज उसकी मदद नहीं करता? आखिर क्यूँ हम उन लोगो का सम्मान नहीं कर पाते जिन्होंने हमें गौरव दिया है? आखिर क्यूँ ये लोग इतिहास का एक हिस्सा बन कर रह जाते है..... इतिहास की सबसे बड़ी खासियत ये है की आप उसे भुला नहीं सकते क्यूंकि जब भी भुलायेंगे वो वर्तमान बनकर आपके सामने आ जायेगा

Friday, September 23, 2011

Film Review: 'Mausam'

हिंदी सिनेमा में बहुत दिनों से किसी खालिस रोमांटिक फिल्म की कमी महसूस की जा रही थी। जब मौसम के प्रोमोज आये तो हर किसी को ये लगा की ये वो फिल्म है जो मोहब्बत के नए मायने सामने लाएगी। फिल्म का प्रमोशन भी कुछ इसी अंदाज़ में हुआ । फिल्म है भी रोमांटिक, मगर अफ़सोस की मौसम काफी कुछ उस तरह की है जिसमे एक लेखक कहानी तो लिख तो देता है पर वो ये नहीं तय कर पाता की इसमें से क्या रखू या क्या हटा दूँ. ? फिल्म में फ्लो का अभाव इस कदर नजर आता है की जैसे ही आप फिल्म को पसंद करने लगते है, आपके मुह पर 10 मिनट की बोरियत का तमाचा पड़ जाता है । पहला हाफ तो फिर भी हंसी मजाक में कट जाता है, लेकिन इंटरवल के बाद तो कई बार मन में ये सवाल उठता है की आखिर ये सीन फिल्म में क्यूँ है ? दरअसल अगर डायरेक्टर खुद अपनी ही फिल्म पर फ़िदा हो जाए तो फिल्म के लिए मुश्किल हो जाती है, और यही बात फिल्म के लिए सबसे खतरनाक साबित हुई।

कहानी -
मौसम की कहानी को उम्र के अलग अलग दौर और उस वक़्त की घटनाओं के मेल से बुना गया है। फिल्म के पहले मौसम में पंजाब के गांव में रहने वाले वाले हैरी (शाहिद) और कश्मीरी से विस्थापित हुई आयत (सोनम) का एक-दूसरे को पसंद किया जाना दिखाया गया है। दोनों फिल्म में कई बार मिलते है, बिछड़ते है । फिल्म में विलेन हालात है जो कभी कश्मीरी आतंकवाद के रूप में तो कभी अयोध्या कार सेवा के रूप में तो कभी बाम्बे ब्लास्ट के रूप में और गुजरात दंगो के रूप में सामने आता है। यकीन मानिये की जब तक कहानी पंजाब में रहती है फिल्म में कशिश रहती है। लडकपन का रोमांस देखना वाकई मज़ेदार लगता है, पर ज्यों ज्यों कहानी आगे बढती है, उसे हज़म करना मुश्किल हो जाता है ।

अभिनय
शाहिद और सोनम दोनों आज के ज़माने के स्टार है। दोनों ने अपना काम अच्छा भी किया है, मगर अलग अलग। रोमांटिक फिल्मो के लिए बहुत ज़रूरी होता है की लड़का और लड़की में केमेस्ट्री दिखे जो अफ़सोस इस फिल्म में नदारद है । एअर फोर्स में शामिल होने के पहले के द्रश्यो में शाहिद कपूर खासे जमे है। सोनम कपूर अपने रोल के मुताबिक फिल्म में मासू‍मियत और खूबसूरती को समेटे हुए है। मगर दोनों साथ साथ उस कदर के ज़ज्बात को सामने नहीं ला पाए जिसका दावा ये फिल्म कर रही थी । जहाँ तक दुसरे कलाकारों की बात करे तो सुप्रिया पाठक बेहतरीन कलाकार है और बुआ के रूप में उन्होंने उम्दा काम किया है, अनुपम खेर भी दिखते है पर यहाँ अदिति शर्मा (रज्जो ) का जिक्र करना ज़रूरी है जो तमाम बड़े कलाकारों के बीच ध्यान खीचने में कामयाब रही है।

म्युज़िक और सिनेमैटोग्राफी
फिल्म म्यूजिकल हिट है। चाहे वो 'रब्बा मैं तो मर गया ओए' हो या फिर "सज धज कर" । इसके अलावा "जब जब चाहा तूने" गाना भी शानदार है. फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष फिल्म का म्युज़िक ही है जो वाकई काबिले तारीफ़ है। इसके अलावा फिल्म के सिनेमैटोग्राफर विनोद प्रधान का काम भी बेहद शानदार है, उनके हर शॉट में खूबसूरती है। रही बात डायलॉग की तो उनमे कुछ खास नहीं है.

आखिरी बात-
तो लाख टके की बात ये है कि माना कि पंकज कपूर बेहद शानदार एक्टर है, ये भी माना कि शाहिद और सोनम सुपर स्टार है, ये भी माना कि रोमांटिक फिल्म का मैदान खाली है और ये भी माना कि फिल्म म्यूजिकल हिट है. मगर अफ़सोस ये सारी बाते फिल्म को अच्छी नहीं बनाते। फिल्म सुस्त है और गैर ज़रूरी द्रश्यो से भरी पड़ी है. तकलीफ तो इस बात की है की गलती बेहद काबिल पंकज कपूर के हाथो हुई. मौसम को 5 में से 2 अंक मिलते है

Thursday, September 22, 2011

Film Review – Speedy Singh

खेलो को ध्यान में रखकर कई सारी फिल्मे बनी है, जिसमे कुछ कामयाब भी हुई है, खास बात ये है की ज़रूरी नहीं है की फिल्म कामयाब तभी होगी जब वो क्रिकेट पर होगी. चक दे खेलो पर बनी सबसे कामयाब फिल्म मानी जाती है जो हॉकी पर बनी थी. अक्षय कुमार की बतौर निर्माता फिल्म स्पीडी सिंह में भी हॉकी है मगर ये हॉकी आइस हॉकी है। "आइस हॉकी" भारतीय दर्शको के लिए एक नयी चीज़ है


कहानी कुछ यूँ है की टोरंटो में बसे भारतीय परिवार के युवक राजवीर की इच्छा है कि वह कनाडा का सबसे मशहूर खेल आइस हाकी खेले पर उसकी राह में सबसे बड़ी बाधा उसके पिता है। एक सिक्ख परिवार में पले-बढ़े राजवीर के पिता चाहते हैं कि वह अपने धर्म और अपने फैमिली बिज़नैस पर ध्यान दे। राजबीर के पिता जब नहीं मानते तो वह पिता से छिपकर एक कोच ढूंढता है, आइस हॉकी टीम बनाता है। उसके बाद अपने अंकल की ट्रक कंपनी को प्रायोजक बनाता है। टीम का नाम होता है “स्पीडी सिंह”. फिल्म में कुछ ट्विस्ट भी है, मसलन कनाडा की हाकी टीम में शामिल होने के लिए जरूरी है कि वह बाल कटवा ले और पगड़ी न पहने। ऐसे में राजवीर कैसे अपनी टीम को राज़ी करता है और फिर क्या वो कामयाब होते है, इस बयान की कहानी स्पीडी सिंह। इस फिल्म में अक्षय कुमार एक खास भूमिका में हैं।


कहानी एक लाइन की है और कुछ खास भी नहीं है, हम ऐसी कहानी पर बनी तमाम फिल्मे देख चुके है, दरअसल खेलो पर बनी फिल्मो में कहानी से ज्यादा ट्रीटमेंट मायने रखता है मसलन साधा हुआ स्क्रीनप्ले और दमदार डायलॉग. याद कीजिये जब चक दे में शाहरुख़ कहते है की "हर टीम में सिर्फ एक ही गुंडा होता है, और इस टीम का गुंडा मै हूँ" . स्पीडी सिंह ट्रीटमेंट के लिहाज़ से फिल्म बड़े ही पुराने ढर्रे पर चलती है. फिल्म के असल प्रोडूसर टोरंटो के बिजनेसमैन अजय विरमानी है और फिल्म के हीरो उनके बेटे विनय विरमानी. जाहिराना तौर पर फिल्म NRI कल्चर में रची बसी है, इसलिए इसमें चक दे जैसे ट्रीटमेंट की उम्मीद करना भी बेमानी होगा.


अब बात अगर एक्टिंग की करे तो फिल्म के हीरो विनय विरमानी इठलाते शरमाते अपना काम कर गए है, फिल्म की नायिका कैमिला बैले है जिनके पास करने के लिए कुछ खास नहीं था, हाँ कोच की भूमिका में अमेरिकन एक्टर रॉब लू ज़रूर जमे है. अनुपम खेर परेशान पिता की भूमिका कई बार कर चुके है. और हाँ स्पीडी सिंह' में अक्षय कुमार भी अतिथि भूमिका में ज्ञान देते नज़र आएंगे।


फिल्म की USP इसका म्युज़िक है, जिसे दिया है संदीप चोटा ने. सारे गाने पंजाबी है और चार्ट बस्टर्स में छाए हुए है . खासकर शेरा दी कौम काफी चर्चा में है.


दरअसल NRI परिवेश में बनी NRI फिल्म स्पीडी सिंह जिसमे बॉलीवुड के सारे मसाले है भले ही भारतीय दर्शको को ज्यादा न भाए मगर विदेशों में बसे भारतीयों में ये ज़रूर हिट साबित होगी . हम इसे 5 में से 2 अंक देते है

Friday, September 2, 2011

Film Review – Body Guard

सही कहते है की कामयाबी पाना ज्यादा मुश्किल नहीं है, पर उसे बरकरार रखना ज्यादा बड़ी चुनौती है। विश्वास न हो तो धोनी से पूछ लीजिये। सलमान खान के लिए भी अब वक़्त आ गया है की वो इस बात को समझ जाए । दर्शकों का प्यार पाना मुश्किल नहीं पर उसे संभालना हर किसी के बस की बात नहीं। बेशक सलमान खान की आम जनता में गहरी पकड़ है। ये वो लोग है जो जानते है की सलमान की एक्टिंग में कुछ ख़ास नहीं है, अगर सलमान को कुछ स्पेशल बनाता है तो वो उनका स्टाइल है। चाहे वो वांटेड हो या दबंग या रेडी, किसी भी फिल्म में सलमान खान की एक्टिंग की नहीं बल्कि उनके अंदाज़ की तारीफ़ हुई है, लेकिन सलमान को भी अपने "लॉयल दर्शकों" के बारे में सोचना पड़ेगा वरना भेडचाल के चलते उनकी फिल्म को बड़ी ओपनिंग तो मिल जाएगी पर उसके बाद मुश्किल आएगी, और इसी तरह चलता रहा तो कुछ वक़्त बाद बम्पर ओपनिंग भी मुश्किल हो जायेगी।

बॉडीगार्ड में सलमान फिर से "मेरा ही जलवा" के तर्ज़ पर है, लेकिन अगर बात फिल्म की कहानी की करे तो उसमे जरा भी दम नहीं है। कहा तो ये गया था की फिल्म इंटरटेनमेंट के सारे मसाले है लेकिन हकीकत ये है की फिल्म में ने तो मजेदार कॉमेडी है, न असरदार रोमांस, रही बात USP एक्शन की तो वो भी बेवजह का लगता है । कहानी कुछ यूँ है की बॉडीगार्ड लवली सिंह (खान) को एक रईस और इज्ज़तदार ठाकुर सरताज राणा (बब्बर) की बेटी दिव्या (करीना) की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी मिलती है। बॉडीगार्ड होने तक तो ठीक था पर एक दिन दिव्या को उससे प्यार हो जाता है। अब बॉडीगार्ड तो बॉडीगार्ड, वो प्यार कैसे कर सकता है, ख़ास बात ये है की उस बेचारे को पता भी नहीं है की वो जिसका बॉडीगार्ड है वही उससे प्यार करती है. तमाम बेवजह के मोड़ो के बाद बॉडीगार्ड और दिव्या के प्यार को मंजिल मिलती है । कहानी भी ढीली है और इस बार सलमान के डायलोग भी उतना असर नहीं डालते, हाँ एक बात है की जहां भी मौका मिला है, सलमान बॉडी दिखाने से नहीं चूंके है। करीना कपूर अपने देसी लुक में खुबसूरत लगी हैं, बाकियों की बात न ही करे तो अच्छा है।

हाँ फिल्म का म्युज़िक अच्छा है, लंबे अर्से बाद हिमेश रेशमिया एक ज़माने के अपने आका सलमान की फिल्म में वापस आये है और हिमेश ने अपने काम को बखूबी अंजाम दिया। यहाँ पर फिल्म के एक गाने "तेरी मेरी प्रेम कहानिया" का ज़िक्र ज़रूर करना होगा जो सुनने और देखने दोनों में बेहतरीन है.

सौ लफ्जों की एक बात की सलमान की हवा क्या आंधी चल रही है, ऐसे में ये फिल्म न केवल चल ही जाएगी बल्कि पैसे भी खूब कमाएगी लेकिन वक़्त आ गया है की सलमान को ये सोचना चाहिए की हमेशा ये दौर नहीं रहेगा.

आखिर में एक बात कि " सलमान भाई मुझ पर एक अहसान ज़रूर करना कि दुबारा बॉडीगार्ड जैसे एहसान मत करना"

Thursday, July 14, 2011

बेशर्म बयान

राहुल गाँधी कहते है- साल में एक-दो हमले तो हो ही सकते हैं...

दिग्विजय कहते है- हम पाकिस्तान की तुलना में बेहतर हैं, वहां हर हफ्ते धमाके होते रहते है

सत्यव्रत कहते है- कौन सा पहाड़ टूट पड़ा

सुबोधकांत सहाय- (मुंबई धमाकों के बाद फैशन शो के मजे लूट रहे थे) कहते है- जिंदगी चलती रहनी चाहिए

चिंदबरम कहते है- पूरी दुनिया में होती रहती हैं आतंकी घटनाएं।

जब आप और हम बम धमाकों की वजह से कुछ कुछ गुस्से में, कुछ कुछ परेशां और बहुत ज्यादा तड़प में थे, तब आंसू बहाती मुंबई और मुंबईकरो के जख्मों पर कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी नमक चस्पा कर रहे थे। राहुल गांधी ने मुंबई हमलों पर ऐसा बयान दिया है, सुन कर ही नसों में उबाल आता है, कोई बाहरी कहे तो आप मारपीट पर उतर आयेंगे, पर ये सज्जन तो देश पर राज करने वाली पार्टी के युवराज है । उनके मुताबिक आतंकी हमलों को पूरी तरह से रोका नहीं जा सकता और एक दो धमाके तो हो ही सकते हैं। अमेरिका वाले जब ईराक और अफगानिस्तान में अपने नागरिको पर हमले नहीं रोक पाए तो हम कहाँ से रोके, राहुल ने कहा है कि हम बहुत से हमले रोक लेते हैं फिर एक दो हमले हो जाते हैं तो क्या हुआ।

असंवेदनशीलता और मुर्खता का अद्भुत संगम है श्री गाँधी का ये बयान। शर्म भी नहीं आती उन्हें ये कहने में की "साल में एक-दो हमले तो हो ही सकते हैं, ऐसे हमले रोकना मुश्किल काम है" । चूँकि काम मुश्किल है इसलिए कांग्रेस इस काम को करेंगी ही नहीं। हमले होते है तो होते रहें। मरते रहेंगे लोग। मुंबई में शाम को जब ये हमले हुए तो मै शिफ्ट में था, चारो तरफ खून, लाशो के बिखरे हिस्से और डरे सहमे लोगो के विजुअल्स मैंने आते देखे, न जाने ऐसे कितने दृश्य थे जो इतने वीभत्स थे की उन्हें चैनल पर चलने से रोक दिया गया। सोचिये की उन माँ बाप पर क्या गुज़रती होगी है जब सुबह काम पर घर से निकले बेटे की लाश टुकड़ों में आती है। कैसे वो एक बिखरे शरीर को जोड़ कर कहता होगा की यही है मेरा बेटा। चेहरा पहचान में नहीं आता होगा तो कभी अलग पड़े हाथ की घडी से तो कभी बिखरे पैर पर पड़े बचपन के किसी निशान से पहचानता होगा की हाँ ये जो टुकड़े पड़े है, इन्हें जोड़ो तो मेरा बेटा बनेगा। ………….बेवकूफ आदमी, समझने को तैयार ही नहीं है की "साल में एक-दो हमले तो हो ही सकते हैं"

अब जानिये की उनके गुरु गोविन्द दिग्विजय सिंह क्या कहते है, दिग्गी के मुताबिक “सवा अरब लोगों के देश में ऐसा हो जाता है। कम से कम हम पाकिस्तान की तुलना में बेहतर हैं, वहां हर हफ्ते धमाके होते रहते है। दिग्गी ने ये शानदार सफाई दी अपने चेले राहुल को बचाने के लिए। अब चूँकि राहुल ने ही कह दिया कि एक दो हमले तो हो ही सकते हैं, तो हो सकते हैं। दिग्विजय सिंह की महिमा पर तो मै सालो से कुर्बान हूँ। ये वही सज्जन है जो "लादेन जी" कहते है। अब ये पाकिस्तान से बेहतरी पर ताली पीट रहे हैं। उस पाकिस्तान से जहां प्रधानमंत्री को लात मार कर भगा दिया जाता है, और सेना जब चाहे सत्ता पर काबिज हो जाती है। राहुल गांधी की शान में कसीदे पढ़ते हुए दिग्विजय सिंह को कठ्मुल्लाओ के हाथ में बंधक पाकिस्तानी लोकतंत्र से भारत की तुलना करते हुए शर्म भी नहीं आई।

गृहमंत्री पी चिदंबरम मुंबई धमाकों पर बहाना बनाने के अलावा बेतुकी दुलीलें भी दे रहे हैं। चिंदबरम का कहना है कि पूरी दुनिया में होती रहती हैं आतंकी घटनाएं। इनका कहना है कि 31 महीने में मुंबई में कोई धमाका नहीं हुआ और बुधवार को जहां धमाके हुए वो संकरी गलियां हैं। खुश हो जाइए मिस्टर चिदंबरम, पर 27 साल के प्रभात के परिवार वालो का क्या । प्रभात दोस्तों से मिलने ओपेरा हाउस गया था। शादी महज 8 महीने पहले हुई थी। ब्लास्ट में वो नहीं रहा, पर चिदंबरम साहब की उपलब्धि है की 31 महीने में मुंबई में कोई धमाका नहीं हुआ। बात भी खुश होने वाली है की आखिर आमची मुंबई अभी तक काबुल नहीं हुई है।

एक और नेता है, नाम है सत्यब्रत चतुर्वेदी, इनका कहना है की "कौन सा पहाड़ टूट पड़ा है" । बात तो सच है, केंद्र में कांग्रेस, महारष्ट्र में कांग्रेस, और मुंबई में लगातार बम धमाके। इस बार के धमाको में तो 50 लोग भी नहीं मरे, फिर कौन सा पहाड़ टूटा पड़ा है।

ताज़ा ताज़ा सामने आये है सुबोध कान्त सहाय। बुधवार की शाम जब मुंबई में एक के बाद एक तीन धमाके हुए थे, उसी शाम दिल्ली में केंद्रीय पर्यटन मंत्री सुबोधकांत सहाय दिल्ली के पांच सितारा होटल में रैंप पर कैटवॉक देख रहे थे। कम से कम इनको ऐश्रवर्या राय से सीखना चाहिए जिसने धमाके की खबर लगते ही दिल्ली में फ्रांस की तरफ से दिए गए सम्मान के लिए आयोजित समारोह को टलवा दिया। फैशन शो के बाद जब इनसे मुंबई धमाको के बारे में पूछा गया तो सरकार कहते की " जिंदगी चलती रहनी चाहिए". शाबाश सहाय साहब, क्या बात है। आखिर जिंदगी जिंदादिली का नाम है, मुर्दादिल तो वो मुंबई वाले है और वो साले मरते रहेंगे

तो जनाब ऐसा है की आप जनता है और आप के नसीब में है मरना। तो आप मरते रहिये, पर खुश रहिये

क्यूंकि ---जिंदगी चलती रहनी चाहिए
क्यूंकि ---साल में एक-दो हमले तो हो ही सकते हैं...
क्यूंकि ---हम पाकिस्तान की तुलना में बेहतर हैं, वहां हर हफ्ते धमाके होते रहते है
क्यूंकि ---कौन सा पहाड़ टूट पड़ा
क्यूंकि ---पूरी दुनिया में होती रहती हैं आतंकी घटनाएं।